राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के NDA से उम्मीदवार बनने के बाद अब जनजातियों पर नजर


राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के NDA से उम्मीदवार बनने के बाद अब जनजातियों पर नजर

मुर्मू ओडिशा के संथाल समुदाय से हैं, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है.

नई दिल्ली:

 राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद अब ध्यान जनजातियों पर टिक गया है, जिनका देश की आबादी में 8.67 फीसदी हिस्सा है. मुर्मू ओडिशा के संथाल समुदाय से हैं, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा जनजातीय समूह है. यदि मुर्मू राष्ट्रपति बनती हैं, तो राजनीति दल जनजातीय समुदाय को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं. पर्यवेक्षकों को लगता है कि मुर्मू के राष्ट्रपति बनने से भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ओडिशा विधानसभा चुनाव में फायदा होगा, जहां जनजातीय लोगों की अच्छी संख्या है खासकर संथालों की.

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पर्यवेक्षकों के मुताबिक मुर्मू के चयन को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव और ओडिशा विधानसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति के हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है, जहां जनजातीय आबादी कुल आबादी के 22 प्रतिशत से अधिक है. संथाल समुदाय में जन्मीं मुर्मू वर्ष 1997 में ओडिशा के रायरंगपुर नगर पंचायत में पार्षद रही हैं. वह वर्ष 2000 में बीजद-भाजपा गठबंधन सरकार में मंत्री बनीं और वर्ष 2015 में झारखंड में भगवा पार्टी की सरकार के समय वहां की राज्यपाल बनीं.

वर्ष 2017 में उन्होंने – 1976संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव करने वाले विधेयक लौटा दिए थे. इस विधेयक में यह सुनिश्चित करते हुए जनजातियों को अपनी भूमि का व्यावसायिक उपयोग करने का अधिकार देने की मांग की गई थी कि भूमि का स्वामित्व नहीं बदला जाएगा. यह अधिनियम पश्चिम बंगाल के साथ झारखंड की सीमा से लगे क्षेत्र में गैर-जनजातियों को जनजातीय भूमि की बिक्री पर रोक लगाता है.

उत्कल विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर स्मिता नायक ने बताया ‘‘यह साबित करता है कि मुर्मू भाजपा के दबाव के बावजूद संविधान के अनुसार काम कर सकती हैं. आम तौर पर भाजपा में महिला नेताओं को पद मिलते हैं और वे सशक्त होती हैं. मुझे लगता है कि मुर्मू को भी काम करने की आजादी मिलेगी.” नायक ने कहा कि कोई भी राजनीतिक दल किसी महिला और आदिवासी का सीधे तौर पर विरोध नहीं कर सकता. उन्होंने कहा, ‘‘यदि वह राष्ट्रपति के रूप में चुनी जाती हैं, तो कोई भी राजनीतिक दल आदिवासियों की उपेक्षा नहीं कर सकता है.”

ओडिशा के 147 विधानसभा क्षेत्रों और 21 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में जनजातीय समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व क्रमश: 33 और पांच है. इन पांच लोकसभा सीट में से दो-दो सीट पर बीजद और भाजपा का कब्जा है, जबकि कोरापुट सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है. ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजद प्रमुख नवीन पटनायक ने राज्य विधानसभा के सभी सदस्यों से मुर्मू को ‘ओडिशा की बेटी’ के रूप में सर्वसम्मति से समर्थन देने का आग्रह किया, जबकि राज्य भाजपा अध्यक्ष समीर मोहंती ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्तर पर ओडिशा के कई लोगों को बढ़ावा दिया है और मुर्मू का नामांकन राज्य के लिए सबसे बड़ा तोहफा है.

कांग्रेस विधायक मोहम्मद मोकीम ने दावा किया कि बीजद और भाजपा अब मुर्मू के नामांकन का श्रेय लेने की होड़ में हैं. उन्होंने कहा, ‘‘नवीन बाबू को डर है कि कहीं भाजपा उनकी पार्टी के महिला और जनजातीय वोट बैंक को न खा जाए.” भाजपा के वरिष्ठ नेता मनमोहन सामल ने कहा कि हालांकि नवीन पटनायक यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि घोषणा से पहले प्रधानमंत्री ने उन्हें राजग उम्मीदवार के नाम के बारे में सूचित किया था, लेकिन यह सच नहीं है. मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने विभिन्न राज्यों में अपने कार्यक्रमों के दौरान बिरसा मुंडा जैसे आदिवासी समुदाय के नायकों की उपलब्धियों को रेखांकित किया है. वरिष्ठ पत्रकार बीके मिश्रा ने कहा कि भाजपा का लक्ष्य वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव है और मुर्मू के चयन को पार्टी की रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है.

राजनीति विज्ञान के एक प्रोफेसर ने नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर कहा कि, ‘‘आप देख सकते हैं कि कैसे मुर्मू की जनजातीय और महिला पहचान के कारण पार्टियां खुद उनके समर्थन में आगे आ रही हैं. बीजद उनके लिए प्रदेश की बेटी होने के बहाने प्रचार अभियान चला रही है.” अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता गणेश्वर बेहरा ने दावा किया कि एक आदिवासी को देश का राष्ट्रपति बनाने से चुनावी राजनीति पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.

 

(इस खबर को एनडीटीवी टीम ने संपादित नहीं किया है. यह सिंडीकेट फीड से सीधे प्रकाशित की गई है।)



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